इलाहाबाद [जासं]। 'यह कैसी परीक्षा आयोग करा रहा है, जब मन आया रिजल्ट निकाला, जब मन आया संशोधित किया और जब मन आया अभ्यर्थी को बाहर कर दिया, यह ठीक नहीं है।' यह तल्ख तेवर गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट का था। अदालत पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा 2010 के संशोधित परीक्षा परिणाम में अनर्ह कर दिए गए छात्रों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
न्यायमूर्ति विनीत शरण और न्यायमूर्ति रणविजय सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। याचियों के अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि आयोग परीक्षार्थियों के आपत्तियों का निस्तारण किए बिना ही परिणाम जारी कर रहा है। प्री-परीक्षा 2010 का संशोधित परीक्षा परिणाम छह जुलाई को जारी किया गया, लेकिन उस समय कट आफ मार्क्स में संशोधन नहीं किया गया। याचिका की सुनवाई के ठीक एक दिन पहले आयोग ने 13 जुलाई को कट आफ मार्क्स भी संशोधित कर दिया। कोर्ट से मांग की गई कि आयोग परीक्षा के 'की-आंसर' को जारी करें। की-आंसर पर आपत्तियों को निस्तारित करें इससे बाद परिणाम घोषित करें।
इस पर कोर्ट ने कहा कि आयोग उस आधार को बताएं जिसके तहत 107 छात्रों को अर्हता सूची से बाहर कर दिया गया साथ ही परीक्षा संबंधित पूरे रिकार्ड को बीस जुलाई को कोर्ट में पेश किया जाए। अधिवक्ता अनिल तिवारी ने बताया कि याचिका की अगली सुनवाई 20 जुलाई से 21 जुलाई तक लगातार होगी।
क्या हैं यह मामला
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा 2010 परिणाम को पहली जून को घोषित किया गया था। इसी पर विवाद शुरू हुआ। अधिवक्ता अनिल बिसेन ने बताया कि इसमें विभिन्न ऐच्छिक विषयों में आयोग द्वारा जारी किए गए उत्तर पत्रक से असंतुष्ट होकर कई विषयों के छात्रों ने परिणाम को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
याचिका की सुनवाई 17 जून को न्यायमूर्ति सुनील अम्बवानी व न्यायमूर्ति सभाजीत यादव की खंडपीठ ने करते हुए लोक सेवा आयोग से जवाब तलब करते हुए सुनवाई की तिथि 14 जुलाई नियत की थी। लेकिन इसके पूर्व ही छह जुलाई को आयोग ने संशोधित परिणाम घोषित कर दिया। इससे पूर्व में मुख्य परीक्षा के लिए अर्ह 107 छात्र बाहर हो गए और 122 ऐसे छात्रों को मुख्य परीक्षा के लिए मौका मिला, जिन्हें पूर्व में अनर्ह पाया गया था। इस पर संशोधित परिणाम में अनर्ह किए गये छात्रों ने 12 जुलाई को याचिका दाखिल करके परिणाम को चुनौती दी।
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