Wednesday, 22 June 2011

नहीं बनी बात, अनशन पर बैठेंगे अन्ना

लोकपाल बिल के मसौदे को लेकर सिविल सोसाइटी और सरकार की ओर से तकरीबन ढाई महीने की कवायद का कोई नतीजा नहीं निकला। मंगलवार को अंतिम बैठक में दोनों पक्षों के बीच बात नहीं बन पाई। इसके बाद समाजसेवी अन्ना हजारे ने सरकार को सबक सिखाने के लिए 16 अगस्त से फिर से अनशन पर बैठने का ऐलान कर दिया।

लोकपाल के दायरे से बाहर 
सरकार ने टीम अन्ना को धड़ाम करते हुए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने से साफ इनकार कर दिया है। सरकार के मसौदे में प्रधानमंत्री के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। टीम अन्ना के प्रस्तावित मसौदे को सरकार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिधि से बाहर एक और समानांतर सरकार हरगिज स्वीकार नहीं करेगी। इस तरह टीम अन्ना और सरकार के बीच लोकपाल पर कायम गहरे मतभेद आखिर तक खत्म नहीं हुए।

सरकार के नुमाइंदों की ही भरमार
नौ बैठकों की मशक्कत के बाद सरकारी बिल के मसौदे से निराश टीम अन्ना ने कहा कि सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त लोकपाल संस्था के जन्म लेने से पहले ही उसे मार देने की रूपरेखा बना ली है। टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार का लोकपाल केवल प्रतीकात्मक होगा और यह परोक्ष रुप से सरकार के अधीन होगा। सरकार का यह लोकपाल भ्रष्टाचार विरोधी एक स्वतंत्र एजेंसी कतई नहीं होगी क्योंकि लोकपाल की नियुक्तिपैनल में सरकार के नुमाइंदों की ही भरमार होगी।

संविधान ने यह अधिकार दिया
लोकपाल की नियुक्ति पैनल में कैग, पूर्व चुनाव आयुक्त समेत तमाम क्षेत्रों के नागरिक प्रतिनिधियों की बहुलता के उनके प्रस्ताव को भी नहीं माना गया है। संसद के अंदर सांसदों के पैसे लेकर वोट देने या भाषण सरीखे मामलों को लोकपाल में शामिल करने से सरकार ने इनकार किया है। मसौदा समिति के सरकारी सदस्य संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने संविधान की दुहाई देते हुए कहा कि ऐसा करना संभव नहीं क्योंकि सांसदों को संविधान ने यह अधिकार दिया है। टीम अन्ना पर कटाक्ष करते हुए सिब्बल ने कहा कि मसौदा समिति बिल के लिए बनी थी संविधान में बदलाव के बारे में इसको कोई अधिकार नहीं था।

आंखों में धूल झोंकने जैसा 
टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण और केजरीवाल ने भी माना कि सरकारी मसौदे में उनकी सारी अहम मांगे शामिल नहीं हैं और सरकार का प्रस्तावित लोकपाल वस्तुतः आंखों में धूल झोंकने जैसा है। बहराहल नौंवी बैठक में सरकार ने अपना 25 पेज का बिल टीम अन्ना को थमाया तो सत्ता की सियासत की असलियत से रूबरू होकर भारी मन से टीम अन्ना ने 33 पेज का अपना ड्राफ्ट सौंपा। इसी के साथ संयुक्त मसौदा समिति का पर्दा गिर गया। टीम अन्ना की हताशा कम करने के लिए सरकार ने अपने मसौदे के साथ उनके ड्राफ्ट को भी कैबिनेट और राजनीतिक दलों के साथ बैठक में रखने का दिलासा जरूर दिया। सिब्बल ने कहा कि जुलाई में राजनीतिक दलों से चर्चा के बाद वे अपना अंतिम मसौदा और टीम अन्ना का ड्राफ्ट कैबिनेट को सौंप देंगे। भ्रष्टाचार पर नकेल के लिए नागरिक संगठनों की सभी अहम मांग को ठुकराने के बाद भी सिब्बल ने मानसून सत्र में भ्रष्टाचार विरोधी मजबूत लोकपाल बिल पेश करने का दावा करने से भी गुरेज नहीं किया।

मसौदे पर मतभेद
सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद में सांसदों के आचरण को लोकपाल के दायरे में शामिल करने से इनकार कर दिया है। सीबीआई और सीवीसी को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार ने पूरी नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग को खारिज करते हुए केवल ग्रुप ए स्तर के अधिकारियों को ही दायरे में रखा है। लोकपाल की नियुक्ति और उन्हें हटाने की प्रक्रिया पर भी मतभेद हैं। लोकपाल की नियुक्ति पैनल में कैग और पूर्व चुनाव आयुक्त को रखने की टीम अन्ना की मांग को भी सरकार ने नहीं माना है।

A.U.News

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