Friday, 17 June 2011

मंगलकारी होने से 'कामसूत्र' ने पाई लोकप्रियता.

हर मनुष्‍य यह कामना करता है कि वह जीवन को श्रेष्‍ठतर और आनंददायक तरीके जिए. इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए ज्ञान की नितांत आवश्‍यकता होती है, अन्‍यथा इसके अभाव में पुरुषार्थ कभी सिद्घ नहीं हो सकता है.

हमारे शास्‍त्रकारों ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताए हैं- 'धर्म', 'अर्थ', 'काम' और 'मोक्ष'. सरल शब्‍दों में कहें, तो धर्मानुकूल आचरण करना, जीवन-यापन के लिए उचित तरीके से धन कमाना, मर्यादित रीति से काम का आनंद उठाना और अंतत: जीवन के अनसुलझे गूढ़ प्रश्‍नों के हल की तलाश करना. वासना से बचते हुए आनंददायक तरीके से काम का आनंद उठाने के लिए कामसूत्र के उचित ज्ञान की आवश्‍यकता होती है. वात्‍स्‍यायन का कामसूत्र इस उद्देश्‍य की पूर्ति में एकदम साबित होता है. 

जीवन के इन चारों पुरुषार्थों के बीच संतुलन बहुत ही आवश्‍यक है. ऋषि-मुनियों ने इसकी व्‍यवस्‍था बहुत ही सोच-विचारकर दी है. यानी ऐसा न हो कि कोई केवल धन कमाने के पीछे ही पड़ा रहे और नीति-शास्‍त्रों को बिलकुल ही भूल जाए. या काम-क्रीड़ा में इतना ज्‍यादा डूब जाए कि उसे संसार को रचने वाले की सुध ही न रह जाए.

कौन थे महर्षि वात्‍स्‍यायन
महर्षि वात्स्यायन भारत के प्राचीनकालीन महान दार्शनिक थे. इनके काल के विषय में इतिहासकार एकमत नहीं हैं. अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि का काल निर्धारण नहीं हो पाया है. कुछ स्‍थानों पर इनका जीवनकाल ईसा की पहली शताब्‍दी से पांचवीं शताब्‍दी के बीच उल्लिखित है. वे 'कामसूत्र' और 'न्यायसूत्रभाष्य' नामक कालजयी ग्रथों के रचयिता थे.

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