Thursday, 23 June 2011

अंडरव‌र्ल्ड ही नहीं, पुलिस से भी है खतरा

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : 'आज मीडिया व पत्रकार कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। खासकर वे पत्रकार ज्यादा असुरक्षित हैं जो खोजी या अपराध विशेष समाचारों में जुटे हुए हैं। हैरत की बात यह कि पत्रकारों को सिर्फ बदमाश, माफिया, नेता और अंडरव‌र्ल्ड से ही खतरा नहीं है बल्कि वे पुलिस और जांच एजेंसियों के भी निशाने पर हैं। लिहाजा, सभी पत्रकारों को एकजुट होकर इसका मुकाबला करना चाहिए'।

कुछ यही निष्कर्ष था फाउंडेशन फोर मीडिया प्रोफेशनल्स द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित विचार संगोष्ठी का। संगोष्ठी का आयोजन मुंबई में जागरण समूह के अंग्रेजी अखबार मिड डे के पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या से उपजे सवालों को लेकर किया गया था। 'शूटिंग द मैसेंजर्स' विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार जे डे की हत्या के 13 दिन बीतने पर भी हत्यारों को गिरफ्तार न करने पर मुंबई पुलिस की कड़ी निंदा की गई।

संगोष्ठी की खास बात यह रही कि इसमें जो वक्ता शामिल थे वे खुद कहीं न कहीं पुलिस, सीबीआइ, माफिया, अंडरव‌र्ल्ड, माओवादी, बदमाशों से पीड़ित थे। यहां तक कि पुलिस और सीबीआइ द्वारा दर्ज गलत मुकदमों से जूझ रहे हैं। इनमें कई महिला पत्रकार भी शामिल हैं।

संगोष्ठी का संचालन सीएनएन- आईबीएन की डिप्टी एडिटर सागरिका घोष ने किया। वक्ताओं में मुंबई मिड डे के एग्जीक्यूटिव एडिटर सचिन कालबाग, गौतम नौलखा, टाइम्स आफ इंडिया रायपुर की खोजी पत्रकार सुप्रिया शर्मा, बंगलुरू तहलका की महिला पत्रकार केके साहिना, मुंबई पत्रकार संघ के अध्यक्ष जतिन देसाई, तहलका के पूर्व खोजी पत्रकार कुमार बादल शामिल थे। संगोष्ठी की शुरूआत करने से पहले जे डे की याद में एक मिनट का मौन रख उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई। तत्पश्चात मुंबई मिड डे के एग्जीक्यूटिव एडिटर सचिन कालबाग ने जे डे की हत्या के संबंध में जानकारी दी। यह बताते हुए उनकी आंखें नम हो गई कि उम्र में सबसे वरिष्ठ होने के बावजूद जे डे सभी को न केवल सर या मैडम कहकर बुलाते थे बल्कि मजबूत कद काठी के होने के बाद भी बेहद विनम्र स्वभाव के थे। उन्होंने कहा कि हत्या के पीछे कोई एक खोजी स्टोरी नहीं कही जा सकती। क्योंकि जे डे ने न केवल तेल माफिया, अंडरव‌र्ल्ड, बदमाश, स्थानीय नेताओं पर दर्जनों खोजपरक रिपोर्ट छापी बल्कि पुलिस पर भी कई खबरें की। यही हत्या की वजह बनी। लेकिन बहुत शर्म की बात है कि पुलिस और सरकार 13 दिन बाद भी उनके हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी है। उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है जब एक प्लेटफार्म पर आकर पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर देश भर में एकजुट हुआ जाए। उन्होंने यह भी बताया कि अकेले मुंबई में बीते दो साल में 184 पत्रकारों पर हमले हो चुके हैं जिसमें कई महिला पत्रकार भी हैं।

जतिन देसाई ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार जे डे की हत्या पर गंभीर ही नहीं है। उन्हें न तो स्थानीय पुलिस, न ही राज्य सीआईडी पर भरोसा है। वे चाहते हैं कि इसकी जांच सीबीआइ द्वारा करवाई जाए। माओवादी के गढ़ दंतेवाड़ा और रायपुर में रिपोर्टिग कर रही सुप्रिया ने कहा कि उन्हें माओवादी से जितना खतरा है उससे कहीं ज्यादा पुलिस से है। कई बार पुलिस ने उन पर और वहां के पत्रकारों पर जुल्म किए हैं। कर्नाटक में 2008 में दंगे के दौरान तहलका के पत्रकार के रूप में रिपोर्टिग करने वाली साहिन ने बताया कि किस तरह दंगे में पुलिस के जुल्मोसितम कवर करने के बाद पुलिस ने न केवल उन्हें बुरी तरह परेशान किया बल्कि आतंकवादी तक करार देकर फर्जी मुकदमा डाल दिया जो अभी भी कर्नाटक हाईकोर्ट में है। कुमार बादल ने बताया कि वे भी खोजी खबर लिखने के कारण सीबीआइ के जुल्म का शिकार हुए हैं। फर्जी मुकदमे के कारण उन्हें साढ़े छह माह जेल में भी रहने पड़ा और आज भी उन पर मुकदमा चल रहा है।

Jagran News

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