Sunday, 19 June 2011

लोकपाल के दायरे से बाहर रहे प्रधानमंत्री

केंद्र सरकार ने शनिवार को साफ कर दिया कि वह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के खिलाफ है। सरकार संसद के अंदर सांसदों के आचरण और न्यायपालिका को भी लोकपाल की जद में लाने पर भी सहमत नहीं है। 

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार यही मानती है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। लेकिन हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री का पद छोड़ते ही व्यक्ति लोकपाल की जद में हो। हालांकि संयुक्त मसौदा समिति के सदस्य सिब्बल ने यह भी कहा कि यदि सिविल सोसाइटी के सदस्य मजबूत तर्क देते हैं तो समिति में शामिल सरकार के पांच मंत्री पीएम को प्रस्तावित कानून के दायरे में लाने पर राजी होने को भी तैयार हैं। 

एक कार्यक्रम में सिब्बल ने कहा कि यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति या मनमोहन सिंह की बात नहीं, बल्कि एक संस्था का मसला है। उन्होंने सवाल किया कि क्या दुनिया में कहीं किसी प्रधानमंत्री पर अभियोग चला है। क्या ऐसा एक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सरकार का रुख इस पर भी साफ है कि संसद में सांसदों का आचरण लोकपाल के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। जो भी संसद के अंदर होता है, स्पीकर और सदन की उसे देखने की जिम्मेदारी होनी चाहिए न कि लोकपाल की। हम सदन में ही एक तंत्र बना सकते हैं, जिसमें आचरण समिति के अपराध होने के नतीजे पर पहुंचने के बाद जांच की इजाजत दी जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने के खिलाफ है। 

हालांकि न्यायपालिका जवाबदेही विधेयक के लिए यदि सिविल सोसाइटी के सदस्य कोई सुझाव देते हैं तो उस पर विचार किया जाएगा। सिब्बल ने कहा कि सरकार संयुक्त सचिव से नीचे के अधिकारियों को लोकपाल की जद में लाने को तैयार है। लेकिन वह सीबीआई और सीवीसी को इसके दायरे में रखने पर राजी नहीं है। समाजसेवी अन्ना हजारे पर हमला बोलते हुए सिब्बल ने कहा कि यदि अन्ना निर्वाचित सदन में होते तो वहां कोई संविधान ही नहीं होता। 16 अगस्त को अन्ना की अनशन पर जाने की धमकी पर उन्होंने कहा कि सरकार इस मसले को देखेगी। सिब्बल ने कहा कि उपवास खुद को शुद्ध करने के लिए है न कि आक्रामकता दिखाने के लिए। मुझे लगता है कि अन्ना समेत बहुत से लोगों ने अनशन का गलत मतलब निकाला है।


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