Tuesday, 21 June 2011

कहीं नागनाथ भी न बन जाएं निगमानंद

गंगा की मुक्ति के लिए तीन साल से कर रहे अनशन 
वाराणसी। गंगा से अवैध खनन रोकवाने के लिए स्वामी निगमानंद ने हरिद्वार में १०५ दिनों तक अनशन किया। उनकी मौत के बाद उत्तराखंड में हंगामा मचा हुआ है। गंगा को टिहरी बांध से मुक्त कराने के लिए बनारस में लगभग तीन साल से एक साधु अनशन कर रहे हैं। हड्डियों का ढांचा बन गए इस साधु की सुध किसी को नहीं है। शुरुआती दौर में उनके अनशन पर ध्यान दिया भी गया था लेकिन अब किसी को उनकी परवाह नहीं है। 
काशी के मणिकर्णिका घाट स्थित महाश्मशाननाथ मंदिर के पीठाधीश नागनाथ योगेश्वर ने १९ जलाई २००८ को गंगा की मुक्ति के लिए अनशन शुरू किया था। गंगा को टिहरी बांध से छोड़ने, अविरल प्रवाह बनाने, गंगा में कछुआ सेंचुरी के नाम पर गंगा की खोदाई पर लगी रोक हटाने, गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने और उसे स्वच्छ रखने आदि पांच सूत्रीय मांगों के समर्थन में अन्न त्याग दिया था। शुरुआत में प्रशासन उनके अनशन को लेकर संजीदा दिखा। तबियत बिगड़ने पर दो बार अस्पताल में भर्ती भी कराया गया लेकिन नागनाथ योगेश्वर वहां से भागकर मंदिर में आ गए। वह बीच में गंगा के लिए जन समर्थन जुटाने हैदराबाद गए। वर्ष २०१० में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल बनारस आईं तो उनसे मिलने गए। प्रधानमंत्री सहित तमाम मंत्रियों को खत लिखा। पर उनकी मांगों पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। भाजपा के कुछ नेताओं ने भी उनसे मुलाकात की। उसके बाद उनकी तरफ सबने ध्यान देना बंद कर दिया। अनशन के १०६४ दिन बाद भी बाबा नागनाथ योगेश्वर का कहना है कि जब तक गंगा मुक्त नहीं करेंगे तब तक अन्न ग्रहण नहीं करूंगा। गंगा मुक्त हो जाएंगी तो वह अपने आप स्वच्छ हो जाएंगी। गंगाजल में सब कुछ बहा ले जाने की क्षमता है। उनके समर्थन में गंगा जनजागरण अभियान भी शुरू हो गया है। अभियान के सदस्यों ने प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड भेज रहे हैं। दिल्ली में धरना देने का भी इरादा किया गया था लेकिन अनुमति नहीं मिली। बाबा नागनाथ ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से डाक्टरेट डिग्री हासिल की है।
A.U. News

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