पिछले दिनों दिल्ली के राजघाट पर अन्ना हजारे और उनके साथी जब उपवास पर बैठे थे, तब किरण बेदी ने अपने भाषण में बार-बार अन्ना को दूसरा महात्मा गांधी बताया। दरअसल जब से अन्ना हजारे का उपवास सफल हुआ है, तब से उनके सहयोगी बहुत उत्साहित हैं। इस उत्साह में वे बार-बार अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गांधी से कर रहे हैं। बेशक अन्ना ने पूरा जीवन अपने गांव के सुधार के लिए समर्पित कर दिया और भ्रष्टाचार के सवाल पर महाराष्ट्र में कुछ खास लोगों के खिलाफ सत्याग्रह करते रहे हैं। पर इससे उन्हें बापू के बराबर मान लेना ठीक नहीं। अन्ना हजारे के व्यक्तित्व की तुलना महात्मा गांधी के अध्ययन, ज्ञान, राजनीतिक सूझबूझ, विचारधारा, आचरण, जीवन मूल्य और अनुकरणीय व्यवहार से शायद ही की जा सकती है।
राजघाट पर अन्ना और उनके सहयोगियों ने पिछले दिनों जो किया, जो भाषण दिए, जिस शब्दावली का प्रयोग किया, सच तो यह है कि उसका बापू की शब्दावली और विचारधारा से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं। जो लोग अन्ना के समर्थन में उस दिन वहां जुटे थे, उन्हें देखकर भी ऐसा नहीं लगा कि ये लोग आजादी की दूसरी लड़ाई में शमां पर मर मिटने वाले परवाने हैं। टीवी कैमरों के सामने जैसा उत्साह वहां देखा गया, उसे देखकर फिरोजशाह कोटला मैदान में होने वाले क्रिकेट के ट्वंटी-20 मैच के दीवाने दर्शकों की छवि सामने आ रही थी। क्या उनके आचरण से खुद बापू की आत्मा को ठेस नहीं लगी होगी? इस सबसे तो यही लग रहा है कि अन्ना दरअसल बापू का अभिनय करने की चेष्टा कर रहे हैं, पर उस अभिनय की पटकथा कोई और लिख रहा है।
एक सवाल आज पूरे देश को झकझोर रहा है, जिसका उत्तर अन्ना को देना ही चाहिए। वह जानते हैं कि आजादी के बाद से आज तक देश में ऐसे हजारों समर्पित व्यक्ति हैं, जिन्होंने देश के गरीब किसानों, भूमिहीनों, आदिवासियों और श्रमिकों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज भी वे उसी जीवट से, निःस्वार्थ भाव से, निष्काम भावना से, तकलीफ सहकर देश के विभिन्न हिस्सों में गांधी जी के आदर्शों पर जीवन जी रहे हैं।
इन गांधीवादियों ने बिना किसी यश की कामना के, बिना सत्ता की ललक के, बिना अपने त्याग के पुरस्कार की अपेक्षा के पूरा जीवन होम कर दिया। ये हजारों लोग, बापू के शब्दों में, जिंदा शहीद हैं। क्या वजह है कि ये लोग अन्ना के इस नए अवतार में कहीं भी उनके इर्द-गिर्द दिखाई नहीं दे रहे? क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अभियान में वे लोग कहीं नहीं दिखते? इस लड़ाई को उन पुराने गांधीवादियों का आशीर्वाद क्यों नहीं मिला? कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि अन्ना का मौजूदा स्वरूप, कार्यकलाप और वक्तव्य देश के समर्पित गांधीवादियों का विश्वास नहीं जीत पाया है या खुद अन्ना को ही उन पर भरोसा नहीं है? अगर अन्ना हजारे को गांधी के मूल्यों और विचारधारा में तिल भर भी आस्था है, तो उनका पहला प्रयास देश भर के गांधीवादियों को ससम्मान अपने साथ खड़ा करने का होना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं दिखता।
हमने विगत चार और आठ जून को अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और इन दोनों के सहयोगियों को दो खुले पत्र लिखे थे, जिनकी प्रतियां दिल्ली के मीडिया जगत में भी बंटवाई गई थी। उन पत्रों में हमने इन दोनों से भ्रष्टाचार-विरोधी इनकी मुहिम को लेकर कुछ बुनियादी सवाल पूछे थे, जिसका उत्तर आज तक नहीं मिला। इस बीच अन्ना हजारे ने संप्रग की मुखिया सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर कई सवाल खड़े कर दिए। अन्ना ने अपने पत्र में सोनिया गांधी से शिकायत की कि कांग्रेस के लोगों ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हुआ बताया, जिसे वह अपमानजनक मानते हैं। अन्ना से यह पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उन्हें इतना परहेज क्यों है? क्या संघ ने देशद्रोह का कोई काम किया है, क्या उसका कोई प्रमाण उनके पास है?
सोनिया गांधी ने तीखे और संक्षिप्त जवाब में अन्ना को बता दिया है कि अपने पहले पत्र में वह अपना पक्ष रख चुकी हैं। उस पत्र में उन्होंने लिखा था कि वह और उनकी पार्टी किसी का नाम बदनाम करने में यकीन नहीं रखतीं। सोनिया गांधी को इसका भी मलाल है कि अन्ना ने उन्हें लिखी चिट्ठी सार्वजनिक कर दी है। जबकि यूपीए अध्यक्ष को लिखे पत्रों से कहीं न कहीं ऐसा भी लगता है कि अन्ना उनसे अपने गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र चाहते हैं। वह इसे अन्यथा न लें, लेकिन पत्र लिखने के पीछे अगर यही मंशा है, तो यह उनकी मानसिक कमजोरी का ही परिचायक है।
सिर्फ खुद को गांधी कहने या मानने से कुछ नहीं होता। गांधी जैसा आचरण भी जरूरी है। लेकिन अन्ना हजारे तो छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते हैं। संघ से जुड़ा हुआ कह देने भर से वह इतने तिलमिला गए, जबकि बापू ने तो सहनशीलता की मिसाल कायम की थी। उन्हें भी बहुतों ने बहुत कुछ कहा था, लेकिन वह उन सबसे अविचलित अपनी राह पर चलते रहे थे
अन्ना इतने कमजोर क्यों हैं कि किसी के कुछ भी कह देने से उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है? अगर कुछ लोगों का साथ मिल जाने से उन्होंने यह मान लिया है कि वह देश के करीब सवा अरब लोगों के भाग्य नियंता हैं, तो फिर कुछ कहने की जरूरत ही नहीं रह जाती। उन्होंने जो माहौल बनाया है, उससे यह कतई नहीं लग रहा कि जनता को कोई राहत मिलेगी, बल्कि इससे हताशा ही बढ़ेगी। उन्हें अपनी सोच और रणनीति में बुनियादी बदलाव लाने की जरूरत है।
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