ऐसे में सवाल उठता है कि कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की मुहिम रंग लाएगी? क्या बाबा के ऐलान के बाद यूपीए सरकार बाबा की मांगों को मान लेंगी? क्या वास्तव में यूपीए सरकार भ्रष्टाचार और कालेधन के मामले पर गंभीर नजर आ रही है?
क्या कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की मुहिम को विफल करने में पूरी तरह जुटे हुए हैं? क्या उन्हें कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी का मौन समर्थन प्राप्त है?
क्या बाबा रामदेव और अन्ना का जनता के बीच आना राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरी को दिखाता है? क्या जनता का विश्वास राजनेताओं से उठता जा रहा है? क्या बाबा रामदेव को राजनीति में उतर जाना चाहिए?
A.U. News
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