इनमें से ज्यादातर ईमेल आवाज़ नाम के अंतरराष्ट्रीय नॉन-प्रॉफिट संगठन द्वारा चलाई जा रही मुहिम सेव जनलोकपाल बिल - जनलोकपाल बिल को बचाओ, के तहत भेजे गए हैं। इनके अलावा करीब 1100 ईमेल अन्य लोगों ने भेजे हैं जिन्होंने पीएम और जुडिशरी को इस कानून के तहत लाने की पुरजोर वकालत की है।
कुछ लोगों ने कहा है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि नीतिगत फैसले लोकतंत्र के पांचवे स्तंभ यानी जनता की राय को ध्यान में रखकर लिए जाएं। हालांकि कई लोगों ने जॉइंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनाए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। इन लोगों का कहना है कि ओबीसी, धार्मिक संगठनों और अन्य समूहों को सिविल सोसायटी के दायरे से बाहर रखना देश के लिए सही नहीं है क्योंकि सबको साथ लेकर चलना जरूरी है।
करीब 200 ईमेल वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को भेजे गए हैं। इनमें से ज्यादातर पूर्व नौकरशाह हैं जो कहते हैं कि सिविल सोसायटी की कोशिश संसदीय कार्यप्रणाली को कमजोर करेगी। ईमेल लिखने वालों में पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एम. एन. बुच जैसे लोग शामिल हैं। प्रभात कुमार ने एक ड्राफ्ट लोकपाल बिल भेजा है जबकि बुच ने पूछा है कि इस कानून की ड्राफ्टिंग के लिए के लिए स्थापित तौर-तरीकों से अलग रास्ता क्यों चुना जा रहा है? इनमें से कुछ के सुझावों को डीओपीटी की बेवसाइट पर रखा गया है लेकिन ज्यादातर ईमेल जो सरकार रुख के विपरीत हैं, उन्हें वेबसाइट पर नहीं देखा जा सकता।
सूत्रों के मुताबिक 13 हजार लोगों ने Avaaz.org नाम की गैर-सरकारी संस्था की मुहिम के मार्फत ईमेल भेजे हैं। ये सारे ईमेल पीएम, जुडिशरी और संसद के भीतर सांसदों के आचरण को लोकपाल के दायरे में लाने की वकालत करते हैं। आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल, मधु और धर्मेंद्र कुमार सिंह ने भी टीम अन्ना की मांगों का समर्थन किया है।
जितेंद्र शाह का सुझाव है कि एक सख्त और प्रभावी लोकपाल बिल बनाने के साथ-साथ सरकार को अपनी उस नीति को भी बदलना चाहिए जिसके तहत, विसलब्लोअर प्रोटेक्शन ऐक्ट के आने तक गुमनाम लोगों की शिकायत की सुनवाई नहीं हो सकती। मौजूदा समय में बहुत सारे लोग डर की वजह से सामने आकर सरकारी विभागों में हो रही गड़बड़ियों की शिकायत नहीं करते।
उदाहरण के तौर पर नूल नवानी ने कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की शिकायत के लिए एक कॉल सेंटर बनाया जाना चाहिए और सार्वजिनक क्षेत्र में कार्यरत सभी लोगों को सालाना कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर नौकरी देनी चाहिए। यदि इन कर्मचारियों का व्यक्तिगत रेकॉर्ड ठीक रहता है तभी इस कॉन्ट्रैक्ट को रिन्यू करना चाहिए। साथ ही, हर कर्मचारी का एक आईडी नंबर होना चाहिए जिसे दफ्तर में हर कोई देख सके। आशु कुमार ने अपने ईमेल में लोकपाल के विषय पर संविधान विशेषज्ञ फली एस. नरीमन के साक्षात्कार के लिंक भेजे हैं।
डीओपीटी के एक अफसर ने बताया कि अब तक मिले ईमेल संदेशों पर विचार करना ड्राफ्टिंग कमिटी का काम है। हालांकि, ईमेल से आए संदेशों की एक फाइल बनाई जा रही है ताकि लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग के दौरान कभी भी जरूरत पड़ने पर इन लोगों की राय पर विचार किया जा सके।
NBT News.
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