Thursday, 16 June 2011

लोकपाल मामले में छल कर रही है सरकार. अन्ना


नई दिल्ली। गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने गुरुवार को आरोप लगाया कि लोकपाल मामले में संप्रग सरकार लोगों के साथ 'छल' कर रही है। उन्होंने लोकपाल विधेयक मसौदा के दो प्रारूप कैबिनेट को विचार के लिए भेजे जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाया।
सरकार पर वायदा खिलाफी का आरोप लगाते हुए हजारे ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने 'कमजोर' भ्रष्टाचार विरोधी कानून को स्वीकृति दी तो वह जंतर-मंतर पर फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे।
लोकपाल विधेयक पर संयुक्त मसौदा समिति के 'गतिरोध' वाली बैठक के दूसरे दिन उन्होंने कहा कि यदि आप दो मसौदे चाहते हैं तो फिर संयुक्त समिति गठित करने की क्या आवश्यकता थी?
हजारे ने आरोप लगाया कि सरकार हमारा समय खराब कर रही है। हमने अपना मसौदा बहुत पहले तैयार कर लिया था और उनका भी तैयार था। ऐसे में उन्होंने उसे कैबिनेट के समक्ष पहले पेश क्यों नहीं किया। सरकार छल कर रही है।
सरकार और समाज के सदस्य कल छठी बैठक में भी आम राय पर पहुंचने में असफल रहने पर फैसला हुआ कि कैबिनेट के समक्ष विचार के लिए दो विधेयक के मसौदे के दो प्रारूप भेजे जाएं।
सरकार ने जहां मतभेद के मुद्दों पर टिप्पणी के साथ विधेयक के एक ही मसौदे को भेजने की बात कही थी, वहीं समाज के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि मंत्रिमंडल को विधेयक के दो मसौदों पर विचार करना चाहिए।
हजारे ने आरोप लगाया कि सरकार के पास मजबूत लोकपाल विधेयक को लागू करने की 'इच्छाशक्ति' नहीं है जिसमें भ्रष्ट लोगों को जेल भेजने का प्रावधान है।
उन्होंने कहा कि कमजोर विधेयक को स्वीकार करने का क्या मतलब है ? यदि एक कमजोर विधेयक पास हुआ तब हमें इसका विरोध करना होगा। यदि यह एक कमजोर विधेयक होगा तो जनता को इससे कोई लाभ नहीं होगा। हजारे ने आरोप लगाया कि सरकार समय बर्बाद कर रही है।
गांधीवादी कार्यकर्ता ने कहा कि लोकपाल विधेयक लाना सरकार की मंशा नहीं है। हमें इससे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं मिल रहा है। जो भारत को भ्रष्टाचार से छुटकारा नहीं दिला सकता ऐसे मसौदे क्या तुक है। हजारे ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानून देश के गरीबों की मदद करेगा।
विदित हो कि लोकपाल विधेयक के मसौदे पर सरकार ने टीम अन्ना के साथ साझेदारी खत्म कर दी है। अब साझा मसौदा समिति की बैठक तो होगी, लेकिन कोई साझा मसौदा नहीं होगा। यह समिति सरकारी नुमाइंदों और टीम अन्ना के दो अलग-अलग मसौदे बनाएगी। दोनों मसौदे कैबिनेट के पास भेजे जाएंगे और वहां अंतिम फैसला होगा।
बुधवार को हुई साझा मसौदा समिति की बैठक के बाद दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि अधिकांश अहम मुद्दों पर दोनों पक्षों में कोई सहमति नहीं बन रही है। इसलिए दोनों प्रावधान के साथ मसौदा तैयार किया जाएगा। इसे कैबिनेट के सामने रखा जाएगा और अंतिम फैसला वही लेगी। समिति की अगली बैठक अब 20 जून को होगी। इस दौरान अगर समिति का काम पूरा नहीं हुआ तो 21 तारीख को एक और बैठक होगी। उनके मुताबिक हर हाल में सरकार 30 जून से पहले मसौदे को अंतिम रूप दे देना चाहती है।
सरकारी रवैये से टीम अन्ना पूरी तरह असंतुष्ट दिखाई दी। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि कैबिनेट तो सरकार की ही है, ऐसे में वो जो चाहेंगे वही होगा। ऐसा लगता है कि सरकार ने मन बना लिया है कि उसे एक कमजोर लोकपाल ही चाहिए। इसलिए वे बैठक में कोई तर्क भी नहीं देते सिर्फ फैसले सुनाते हैं, लेकिन समिति की बैठक का बहिष्कार करने के बजाय वे इसकी अगली बैठक में शामिल हो कर जनता का पक्ष रखेंगे।
बुधवार की बैठक में लोकपाल के मॉडल और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के अधिकार को ले कर भी चर्चा हुई। सरकार का कहना था कि यह सिर्फ 11 सदस्यों वाली एक संस्था हो और इसके सारे फैसले ये सदस्य ही लें। जबकि टीम अन्ना का कहना था कि अगर इसे मान लिया गया तो लोकपाल जन्म लेने से पहले ही मर जाएगा, क्योंकि इन सदस्यों के लिए सारी शिकायतें सुनना नामुमकिन हो जाएगा। इसलिए दूसरी सरकारी एजेंसियों की तरह इसे भी अपने अधिकारियों को अपने अधिकार सौंपने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसी तरह टीम अन्ना ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और इससे जुड़े कदाचार के मामलों की जांच लोकपाल ही करे। मगर सरकार ने इस सुझाव को भी सिरे से खारिज कर दिया।
समिति में क्यों बने हैं अन्ना?
-जब सरकार ने मसौदे पर साझेदारी खत्म कर दी तो अन्ना हजारे तुरंत इसका बहिष्कार क्यों नहीं कर देते? यह पूछे जाने पर उनके एक करीबी का कहना है कि सरकार की तो मंशा यही है कि वे मसौदा समिति को छोड़ दें। जबकि हम चाहते हैं कि जन लोकपाल के सख्त प्रावधान इस समिति की कार्यवाही का हिस्सा बनें। सरकार अपने मनमाने प्रावधानों को इस समिति का नतीजा नहीं बता सकती।
उनका दूसरा तर्क है कि कैबिनेट तो ऐसे भी ड्राफ्ट में तब्दीली कर सकता था। लेकिन अब जनता के सामने यह साफ होगा कि सरकार की मंशा क्या है। साथ ही ये कहते हैं कि सरकार की मंशा औपचारिक तौर पर स्पष्ट होने के बाद हम फिर से जनता के बीच जाएंगे।
गैर कांग्रेसी दलों को नहीं भाई लोकपाल पर रायशुमारी
नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। लोकपाल विधेयक पर रायशुमारी की केंद्र सरकार की पहल कांग्रेस को छोड़ कर सभी राजनीतिक दलों को नागवार गुजरी है। किसी भी गैर-कांग्रेस पार्टी ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से पूछे गए छह सवालों में से एक का भी जवाब नहीं दिया है। उल्टे इन सभी ने केंद्र पर यह कहते हुए हमला किया है कि आपने साझा मसौदा समिति बनाते समय तो हमें पूछा नहीं, अब मुश्किल में फंसे हैं तो हमारी याद क्यों आ रही है।
वित्त मंत्री की प्रश्नावली पर गंभीर एतराज जताने वालों में भाजपा या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन [राजग] की पार्टियां ही नहीं, सरकार को सहयोग दे रही सपा और बसपा भी शामिल हैं। ऐसे ही तेवर भाजपा, माकपा, भाकपा और बीजद ने भी दिखाए हैं। वरिष्ठ सरकारी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी की ओर से जवाब भेजने की औपचारिकता जरूर पूरी की गई है, लेकिन वह पत्र अब तक वित्त मंत्री के कार्यालय से बाहर नहीं गया है। जबकि बाकी सभी प्रतिक्रियाएं कार्मिक मंत्रालय को भेज दी गई हैं, जो साझा मसौदा समिति के सचिवालय के तौर पर काम कर रहा है।
इन पत्रों का मजमून देखने से साफ हो जाता है कि मानसून सत्र में हर हाल में लोकपाल बिल पेश करने का दावा कर रही केंद्र सरकार इस मामले पर राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई है। ऐसे में अब वह लोकपाल विधेयक का कोई भी मसौदा लाए, दूसरे दलों को साथ नहीं लिए जाने की वजह से उसे जोरदार हमला झेलना पड़ेगा।
रायशुमारी के पीछे सरकार की रणनीति राज्यों और दलों की राय की आड़ में टीम अन्ना के सख्त प्रावधानों से इंकार करने की थी, लेकिन अधिकांश दलों ने अपने जवाब से इसे कांग्रेस की अदूरदर्शिता साबित कर दिया। राजनीतिक दलों के अलावा यह प्रश्नावली राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी भेजी गई थी। देश के 28 राज्यों में से सिर्फ एक ने इस प्रश्नावली का जवाब दिया है।
सरकार को फटकार
नितिन गडकरी [भाजपा]: आप चाहते हैं कि सिविल सोसाइटी और आपकी साझा समिति को पार्टियां अपनी राय दें, जिसे समिति माने या ठुकराए। जबकि संविधान के मुताबिक अंतिम फैसला राजनीतिक दल, सांसदों और संसद का होता है।
मायावती [बसपा]: सदन में बिल पेश किए जाने से पहले उस पर राय मांगना कानून बनाने की स्थापित संसदीय परंपरा और प्रक्रिया के अनुरूप नहीं।
रामगोपाल यादव [सपा]: तथाकथित सिविल सोसाइटी के साथ आप आमने-सामने बैठक करते हैं, हवाई अड्डे जा कर स्वामी रामदेव से बात करते हैं और पार्टियों को प्रश्नावली भेज जवाब मंगवाते हैं। यह स्वीकार्य नहीं।
प्रकाश करात [माकपा]: सिर्फ उन्हीं छह सवालों पर विचार करने की जरूरत नहीं, जिनका आपने हां या नहीं में जवाब मांगा है।
ए.बी. बर्धन [भाकपा]: समिति बनाते समय तो राय नहीं ली। अब एकाएक हां या नां में जवाब मांग रहे हैं। जैसे किसी इम्तहान में वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं।
नवीन पटनायक [बीजद]: समिति बनाने में बीजद से एक बार भी संपर्क नहीं किया गया। अब मसौदा तय होने पर ही हम राय देंगे।

Jagaran News

1 comment:

  1. पवन मिश्र (वाराणसी)16 June 2011 at 04:24

    छल के आलावा अब किया ही क्या है इन नेताओ ने आजतक. ये नेता बन्ने से पहले छल करना सीखते हैं. ये देश द्रोही हैं.

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